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गैर-सरकारी संगठन (NGO) ऐसी संस्थाएं है जो समाज कल्याण के लिए काम करती हैं। इसे एक गैर-लाभकारी संगठन के रूप में भी जाना जाता है जो कला, विज्ञान, खेल, शिक्षा, रिसर्च, सामाजिक कल्याण, धर्म और दान आदि को बढ़ावा देने की दिशा में काम करता है। भारत में विभिन्न प्रकार के NGO हैं जो ट्रस्ट अधिनियम, सोसायटी पंजीकरण अधिनियम या कंपनी अधिनियम के तहत रजिस्टर्ड हैं। एनजीओ को कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 8 के तहत रजिस्टर किया जाता है। इस अधिनियम के तहत रजिस्टर्ड कंपनियां गैर-लाभकारी और चैरिटेबल ट्रस्ट हैं। एक ट्रस्ट या सोसायटी और एनजीओ के बीच एकमात्र अंतर यह है कि ये कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय (MCA) के तहत रजिस्टर्ड होते हैं।
ऑनलाइन फॉर्म भरने से पहले रजिस्ट्रेशन फॉर्म को डायरेक्टर्स द्वारा डिजिटल रूप से साइन किया जाता है। भारत सरकार के अधीन प्रमाणन एजेंसियां डिजिटल सिग्नेचर सर्टिफिकेट (DSC) जारी करती हैं। आवेदकों को डीएससी की क्लास 2 या क्लास 3 कैटेगरी प्राप्त करने की आवश्यकता होती है। डीएससी प्राप्त करने की फीस अलग–अलग होती है और प्रमाणन एजेंसी पर निर्भर करती है।
कंपनी के प्रस्तावित डायरेक्टर्स के लिए आवेदकों को डीआईएन के लिए आवेदन करना आवश्यक है। आवेदन फॉर्म DIR-3 भरने से डीआईएन के अलॉटमेंट में मदद मिलती है। पैन की सेल्फ–अटेस्ट कॉपी, पहचान और निदेशकों के पते के प्रमाण जैसे स्कैन किए गए दस्तावेज़ एप्लीकेशन फॉर्म के साथ जमा करने होते हैं। एप्लीकेशन फॉर्म को मिनिस्ट्री ऑफ कॉर्पोरेट अफेयर्स (MCA) के पोर्टल पर ऑनलाइन जमा किया जा सकता है। दस्तावेजों को एक पेशेवर चार्टर्ड एकाउंटेंट, कंपनी सचिव या कॉस्ट अकाउंटेंट द्वारा वेरिफाई किया जाना आवश्यक है।
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DIN एप्लीकेशन के साथ इन दस्तावेज़ों को लगाना होता है:
पहचान और पता प्रमाण: पासपोर्ट, वोटर आईडी कार्ड, आधार कार्ड, बिजली बिल, ड्राइविंग लाइसेंस, पैन कार्ड, हाउस टैक्स रिसीट, बिज़नेस एड्रेस प्रूफ, सोसायटी का नाम आदि।
INC-12 के साथ लगाए जाने वाले आवश्यक दस्तावेज़:
इन आसान स्टेप्स को फॉलो करने के बाद आवेदक अपनी कंपनी को NGO के रूप में रजिस्टर कर पाएंगे।
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कंपनी अधिनियम, 2013 के तहत अपनी कंपनी को NGO के रूप में रजिस्टर करने के कई फायदें हैं, जिनके बारे में नीचे बताया गया है:-
कंपनी को NGO के रूप में रजिस्टर करने से गैर–सरकारी संगठनों (NGO) के कई तरह के टैक्स माफ कर दिए जाते हैं। इस तरह से वे टैक्स में बचत कर सकते हैं और अपने पैसों को अन्य प्रोजेक्ट्स में निवेश कर लाभ कमा सकते हैं।
सभी कंपनियों को स्वतंत्र रूप से काम करने के लिए मिनिमम शेयर पूंजी की आवश्यकता होती है। गैर–सरकारी संगठनों के मामले में ऐसा नहीं है क्योंकि उन्हें डोनेशन के ज़रिए डाइरेक्ट फंड मिलता है। इसका मतलब है कि एनजीओ को स्वतंत्र रूप से काम करने के लिए अधिक पैसों की जरूरत नहीं पड़ती।
अधिकांश कंपनियां अपनी लिमिटेड लायबिलिटी स्टेटस को सार्वजनिक करने को बाध्य हैं। हालांकि, कंपनी अधिनियम के तहत रजिस्टर्ड कंपनियों के मामले में ऐसा नहीं है। इन रजिस्टर्ड कंपनियों को किसी भी टाइटल के उपयोग से छूट दी गई है। वे अपनी सीमित लिमिटेड लायबिलिटी स्टेट्स को सार्वजनिक किए बिना कार्य कर सकते हैं।
आयकर अधिनियम, 1961 के तहत एनजीओ के रूप में रजिस्टर्ड कंपनियां अपने स्वामित्व या टाइटल को ट्रांसफर करने के लिए प्रतिबंधित नहीं हैं। हालाँकि, अन्य कंपनियाँ अपने स्वामित्व को इतनी आसानी से ट्रांसफर नहीं कर सकती हैं, जिसका लाभ NGOs को मिलता है।
आयकर अधिनियम 2013 के तहत NGO के रूप में रजिस्टर्ड सभी कंपनियों की स्टांप ड्यूटी माफ की गई है। स्टांप ड्यूटी के माध्यम से बचाए गए सभी टैक्स को कंपनी द्वारा निवेश किया जाता है। स्टांप ड्यूटी में मिलने वाले इस लाभ से कंपनी का फंड सुरक्षित रहता है, जिससे कंपनी का कामकाज सुचारू होता है और कंपनी की उत्पादकता बढ़ती है।