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क्रेडिट रिपोर्ट आपकी वित्तीय विश्वसनीयता का आईना होती है। इसमें यह दर्शाया जाता है कि आपने अपने लोन या क्रेडिट कार्ड की अदायगी कितने समय पर की है। लेकिन जब भुगतान में देरी या चूक होती है, तो इसे “डिफॉल्ट” के रूप में दर्ज किया जाता है। ये डिफॉल्ट्स आपके क्रेडिट स्कोर पर नकारात्मक असर डाल सकते हैं और भविष्य में लोन या क्रेडिट कार्ड प्राप्त करना मुश्किल बना सकते हैं। इसलिए यह समझना बेहद ज़रूरी है कि क्रेडिट रिपोर्ट में कौन-कौन से डिफॉल्ट्स दर्ज होते हैं, वे कैसे बनते हैं और उनसे बचने के लिए किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।
यहां नीचे कुछ प्रमुख डिफॉल्ट के बारे में बताया गया है, जो आमतौर पर आपके क्रेडिट रिपोर्ट में हो सकते हैं-
DPD (डेज़ पास्ट ड्यू) आपके क्रेडिट रिपोर्ट में लेट रिपेमेंट को दर्शाता है। लगातार या बार-बार भुगतान में देरी आपके क्रेडिट स्कोर को काफी गिरा सकता है। जिसकी वजह से भविष्य में लोन या क्रेडिट कार्ड मिलना मुश्किल हो सकता है।
बता दें, हर बार की देरी या भुगतान न करना DPD चार्ट में दर्ज होता है, जो कि क्रेडिट रिपोर्ट में 36 महीनों तक बना रहता है। आमतौर पर भुगतान में 90 दिनों से अधिक की देरी होने पर लेंडर्स ऐसे अकाउंट को नॉन-परफॉर्मिंग एसेट यानी गैर निष्पादित परिसंपत्तियां (NPA) मान लेते हैं। यह आपके क्रेडिट स्कोर को इतना प्रभावित करता है कि नया क्रेडिट मिलना बिल्कुल नामुमकिन-सा हो सकता है। हालांकि जब आप अपने बकाया का भुगतान करने लगते हैं तो क्रेडिट स्कोर में धीर-धीरे सुधार होने लगता है।
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जब कोई उधारकर्ता लंबे समय तक अपने लोन या क्रेडिट कार्ड बिल का भुगतान नहीं करता है और बैंक को यह लगने लगता है कि अब रकम की रिकवरी संभव नहीं है, तो ऐसे अकाउंट्स को NPA (नॉन-परफॉर्मिंग एसेट) यानी “डिफॉल्ट अकाउंट” के रूप में चिह्नित कर दिया जाता है।
यह आपके क्रेडिट रिपोर्ट में भी दर्ज हो जाता है, जिससे भविष्य में नया लोन या क्रेडिट कार्ड मिलना लगभग असंभव-सा हो जाता है। क्योंकि बैंक व एनबीएफसी ऐसे उधारकर्ताओं को जोखिमपूर्ण मानते हैं। इसलिए अगर आपके क्रेडिट रिपोर्ट में डिफॉल्ट दर्ज है, तो कम से कम उस लोन अकाउंट को “सेटल्ड” करने की कोशिश करें।
हालांकि सेटलमेंट भी कोई बेहतर समाधान नहीं है, लेकिन डिफॉल्ट से बेहतर विकल्प है। अगर आप सेटलमेंट के बाद जिम्मेदारी से क्रेडिट का इस्तेमाल करते हैं, तो कुछ लेंडर भविष्य में आपके आवेदन पर विचार कर सकते हैं।
जब कोई उधारकर्ता अपनी कमजोर वित्तीय स्थिति के कारण लंबे समय तक EMI नहीं चुका पाता और बैंक या एनबीएफसी को यह महसूस होता है कि अब पूरी राशि की रिकवरी संभव नहीं है, तो वे कुल बकाया राशि से कम रकम लेकर “अकाउंट सेटल करने” का प्रस्ताव दे सकते हैं।
इससे बैंक को अपने नुकसान का कुछ हिस्सा वापस मिल जाता है और उधारकर्ता को भी कर्ज़ के बोझ से आंशिक राहत मिलती है। पहली नज़र में यह दोनों पक्षों के लिए फायदेमंद लग सकता है, लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं होता।
लोन संस्थान को अपने निवेश पर नुकसान झेलना पड़ता है, इसलिए क्रेडिट ब्यूरो “सेटल्ड अकाउंट” को नकारात्मक रूप से दर्ज करते हैं। इसका असर यह होता है कि उधारकर्ता का क्रेडिट स्कोर लंबे समय तक कम बना रहता है और उसे भविष्य में नया लोन मिलना मुश्किल हो जाता है।
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जब कोई उधारकर्ता लंबे समय (आमतौर पर 180 दिन या उससे अधिक) तक अपने लोन या क्रेडिट कार्ड का बकाया नहीं चुकाता, तो बैंक/NBFCs उस अकाउंट को “राइट-ऑफ” घोषित कर देते हैं।
इसका मतलब यह नहीं होता कि कर्ज़ माफ कर दिया गया है, बल्कि लेंडर उस रकम की रिकवरी की उम्मीद छोड़ चुके हैं और इसलिए उसे नुकसान के रूप में दर्ज करते हैं।
यह जानकारी क्रेडिट ब्यूरो में “Written-off” के रूप में रिपोर्ट की जाती है। ऐसा दर्ज होने पर उधारकर्ता का क्रेडिट स्कोर बुरी तरह प्रभावित होती है और उसकी क्रेडिट योग्यता कम हो जाती है।
जब कोई उधारकर्ता लोन या क्रेडिट कार्ड बिल चुकाने की पूरी क्षमता रखता है लेकिन वह “जानबूझकर भुगतान नहीं करता”, ऐसे लोगों को विलफुल डिफॉल्ट अकाउंट की लिस्ट में रखा जाता है। यह लिस्ट रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) द्वारा तैयार की जाती है। इस लिस्ट में शामिल उधारकर्ताओं पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है, साथ ही उनकी संपत्तियां भी जब्त की जा सकती हैं।
इसके अलावा ऐसे लोगों को भविष्य में किसी तरह का लोन या निवेश जुटाने से प्रतिबंधित किया जा सकता है। यह डिफॉल्ट का सबसे बुरा प्रकार माना जाता है। इसमें न सिर्फ क्रेडिट स्कोर में भारी गिरावट होती है बल्कि सुधार की संभावना बिल्कुल न के बराबर होती है।
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किसी भी तरह का “डिफॉल्ट” आपके लोन या क्रेडिट कार्ड अप्रूव्ल को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है। इसलिए ऊपर बताए गए सभी तरह के डिफॉल्ट से बचें। हमेशा अपने बकाया का समय पर पूरा भुगतान करें। ताकि आपका क्रेडिट स्कोर बेहतर बना रहे और आप भविष्य में किसी वित्तीय अवसर से वंचित न रहे।