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कर्मचारियों को दी जाने वाली सैलरी में बेसिक सैलरी, अलाउंस, पर्क्विज़िट जैसे कई घटक शामिल होते हैं। इनके बारे में जानना महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे आपको ये जानकारी मिलती है कि कहाँ बचत हो रही है और किस चीज़ पर आप सालाना टैक्स में छूट प्राप्त कर सकते हैं। सैलरी क्या है, इसकी कैलकुलेशन कैसे होती है, बेसिक सैलरी क्या होती है, ग्रॉस सैलरी क्या होती है, सैलरी में HRA और LTA कितना होता है, वेतन में PF और TDS कितना कटता है, सैलरी स्लिप कैसे बनती है, अन्य जानकारी के लिए ये लेख पढ़ें।
अगर पेरोल की कैलकुलेशन सुव्यवस्थित ढंग से नहीं की जाती है तो कठिनाई आ सकती है। भारत में पेरोल की प्रोसेसिंग हर कंपनी में अलग- अलग होती है लेकिन सैलरी की स्ट्रक्चर वही रहती है। CTC, नेट पे, ग्रॉस सैलरी, अलाउंस, पर्क्विज़िट, टैक्स कटौती, बोनस, इंसेंटिव सैलरी स्ट्रक्चर के ज़रूरी हिस्से हैं।

सैलरी के सभी महत्वपूर्ण घटकों की जानकारी नीचे दी गई है:
सीटीसी या कॉस्ट टू कंपनी (Cost to Company) एक कर्मचारी का सालाना कुल सैलरी पैकेज होता है। सीटीसी में बेसिक सैलरी, अलाउंस, पर्क्विज़िट शामिल होते हैं। सीटीसी कभी भी किसी कर्मचारी की टेक-होम सैलरी नहीं होती है, यानि कि सीटीसी में शामिल पूरी राशि आपको सैलरी के रूप में नहीं मिलती है।
बेसिक सैलरी (Basic Salary) वह राशि होती है जिसमें ना कोई अतिरिक्त लाभ जैसे HRA, बोनस और ना ही किसी प्रकार की टैक्स कटौती शामिल होती है। । इसमें बोनस, ओवरटाइम पे या नियोक्ता से अन्य किसी तरह का मुआवज़ा शामिल नहीं होता है।
ग्रॉस सैलरी (Gross Salary) वह राशि होती है जिसकी कैलकुलेशन टैक्स की कटौती या अन्य किसी तरह की कटौतियों से पहले आपकी बेसिक सैलरी और अलाउंस को जोड़कर की जाती है। इसमें बोनस, ओवरटाइम सैलरी आदि शामिल हैं।
नेट सैलरी या टेक-होम सैलरी (Net Salary or Take Home Salary) वह राशि होती है जो टीडीएस और अन्य कटौती के बाद कैलकुलेट की जाती है। बता दें कि यह राशि हर कंपनी की अपनी एचआर पॉलिसी पर निर्भर करती है।
बेसिक सैलरी (Basic Allowance) के अलावा कर्मचारी को जो लाभ दिए जाते हैं वहीं अलाउंस होते हैं, जिनके कुछ हिस्से या पूरे हिस्से पर टैक्स लागू हो सकता है या टैक्स नहीं भी लग सकता है। हाउस रेंट अलाउंस (HRA), मेडिकल, लीव ट्रैवल अलाउंस (LTA) जैसे अलाउंस हर सैलरी स्ट्रक्चर में शामिल होते हैं।
पर्क्विज़िट (Perquisite) आपकी सैलरी के साथ मिलने वाले अतिरिक्त लाभ होते हैं। ये लाभ कंपनी में कर्मचारी की ऑफिशियल पोज़िशन के आधार पर प्रदान किए जाते हैं। कार, फोन, इंटरनेट सेवाएं और अन्य रोज़मर्रा की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए दिए जाने वाले लाभ लगभग हर कंपनी की पॉलिसी में शामिल होते हैं।
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बोनस (Bonus) एक तरह का रिवार्ड होता है जो एक कर्मचारी को तब प्रदान किया जाता है जब उसने कंपनी के लिए अच्छा काम किया हो। जब भी कोई कंपनी बोनस देती है तो उसका मूलभूत उद्देश्य कंपनी द्वारा अर्जित लाभ को कर्मचारियों और स्टाफ के अन्य सदस्यों के बीच बांटना होता है।
पे-आउट (Payout) वह कुल बड़ी राशि होती है जिसका भुगतान वार्षिक, अर्धवार्षिक रूप से कंपनी के स्टेक-होल्डर को डिविडेंड या एन्युटी के रूप में किया जाता है।
ग्रेच्युटी (Gratuity) सैलरी का ही एक हिस्सा होता है जिसे किसी कर्मचारी को उसकी दी गई सेवाओं के लिए नौकरी छोड़ने पर दिया जाता है। आमतौर पर ग्रेच्युटी 5 साल बाद प्राप्त की जा सकती है, इसे हर साल नियोक्ता/ कंपनी आपके सीटीसी से काटती है।
एरियर (Arrears) वह भुगतान होता है जो उस बकाया सैलरी की भरपाई के लिए दिया जाता है, जिसे सही मायनों में पहले ही दे दिया जाना चाहिए था। कर्मचारियों को एरियर तब दिया जाता है जब किसी महीने में उनकी सैलरी में बढ़ोतरी होती है लेकिन बढ़ी हुई राशि उसे बाद के महीनों में प्राप्त होती है।
इंसेन्टिव कर्मचारियों को मिलने वाला एक तरह का बोनस होता है। ये कर्मचारी के अच्छे प्रदर्शन, उसके द्वारा टारगेट पूरा करने, आदि के लिए दिया जाता है।
जिन लोगों की वार्षिक इनकम 2.5 लाख रु. से 5 लाख रु. तक है, उन्हें इनकम टैक्स सेक्शन 87A के तहत इनकम टैक्स में छूट (Income Tax Rebate) मिलती है।
एचआरए कर्मचारी की सैलरी का हिस्सा होता है जो कंपनी/ नियोक्ता द्वारा कर्मचारी को प्रदान किया जाता है। यह कर्मचारियों को इसलिए दिया जाता है कि अगर वो किराये पर रहते हैं तो किराया आसानी से दे सकें।
पीएफ एक सरकारी योजना है जिसके तहत आपको (अगर आप नौकरीपेशा हैं) और आपकी कंपनी/ नियोक्ता को आपकी सैलरी का 12%, ईपीएफ अकाउंट में जमा करना होता है।
किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत आय पर लगाया जाने वाला टैक्स इनकम टैक्स (Income Tax) कहलाता है। आमतौर पर किसी कर्मचारी को उसकी सैलरी नियोक्ता/ कंपनी द्वारा टैक्स कटौती के बाद ही मिलती है। इस प्रक्रिया को टैक्स डिडक्शन एट सोर्स (TDS) कहा जाता है। कंपनी काटी की गई इस टैक्स राशि का भुगतान सरकार को करती है।
प्रोफ़ेशनल टैक्स (Professional Tax) राज्य सरकार उस व्यक्ति से लेती है जो किसी प्रोफेशन में प्रैक्टिस कर रहा है। इसके तहत हर साल अधिकतम 2,500 रु. काटने का नियम है। यह आपकी महीने की सैलरी और उस राज्य पर भी निर्भर करता है जिसमें आप काम करते हैं। प्रोफेशनल टैक्स भारत में अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग होता है।
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अपने टेक-होम सैलरी या नेट सैलरी को कैलकुलेट करने के लिए, नीचे दिए जानकारी का पालन करें:
ग्रॉस सैलरी = बेसिक सैलरी + एचआरए + अन्य अलाउंस
वैकल्पिक रूप से,
ग्रॉस सैलरी = सीटीसी – (ईपीएफ + ग्रेच्युटी)
टैक्सेबल इनकम = आय (ग्रॉस सैलरी + अन्य आय) – कटौती
आय के उस हिस्से की कैलकुलेशन के लिए जिस पर टैक्स लगेगा, आपको अपनी ग्रॉस सैलरी से अलाउंस (एलटीए, कन्वेयंस अलाउंस, एचआरए), प्रोफेशनल टैक्स, मेडिकल बिल, मेडिकल इंश्योरेंस, टैक्स सेविंग इन्वेस्टमेंट, यदि कोई हो और अन्य डिडक्शन को घटाना होगा। हाउस प्रॉपर्टी, पूंजीगत लाभ, बिज़नेस से इनकम जैसे सभी स्रोतों से ही आय कैलकुलेट करें।
आमतौर पर जो डिडक्शन किए जाते हैं, वे नीचे दिए गए हैं –
| IT सेक्शन | प्रकार | सीमा |
| 80 C | कुल आय से बेसिक डिडक्शन | ₹1.5 लाख |
| 80 TTA | डिपॉज़िट से ब्याज | ब्याज पर ₹10,000, व्यक्ति और हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) के लिए उपलब्ध, बैंक में सेविंग्स अकाउंट से ब्याज अर्जित करने पर डिडक्शन की अनुमति |
| 80 G | चैरिटी के लिए डोनेशन | टैक्सेबल इनकम से डोनशन का 50% डिडक्ट किया जा सकता है |
| 80 E | एजुकेशन लोन | कोई सीमा नहीं |
| 80 EE | होम लोन ब्याज | अधिकतम ₹ 50,000 प्रति वित्त वर्ष |
| 80 D | मेडिकल इंश्योरेंस प्रीमियम | खुद के लिए और परिवार के लिए- ₹25,000, खुद के लिए, फैमिली और पेरेंट्स के लिए- ₹ 55,000, खुद के लिए, फैमिली और वरिष्ठ नागरिकों के लिए – ₹80,000 |
एक बार जब आप टैक्सेबल इनकम को कैलकुलेट कर लेते हैं, तो आप वर्तमान तारीख के मुताबिक आयकर स्लैब (Income Tax Slab) और दरों के मुताबिक आसानी से इनकम टैक्स कैलकुलेट कर सकते हैं। व्यक्तिगत टैक्सपेयर्स को ध्यान में रखते हुए सालाना बजट के दौरान इनकम टैक्स स्लैब दरों में बदलाव किया जाता है। वित्त वर्ष 2025-26 के लिए इनकम टैक्स स्लैब निम्नप्रकार है:
| इनकम टैक्स स्लैब (₹) | टैक्स दर (%) |
| ₹0-4 लाख | शून्य |
| ₹4 – ₹8 लाख | 5% |
| ₹8 – ₹12 लाख | 10% |
| ₹12 – ₹16 लाख | 15% |
| ₹16 – ₹20 लाख | 20% |
| ₹20 – ₹24 लाख | 25% |
| ₹24 लाख से ज्यादा | 30% |
आपकी टेक-होम सैलरी होगी-
टेक होम सैलरी = बेसिक सैलरी + एक्चुअल एचआरए + स्पेशल अलाउंस – इनकम टैक्स – नियोक्ता/ कंपनी का पीएफ योगदान (ईपीएफ)
आइए इसे एक उदाहरण की मदद से समझते हैं:
उदाहरण के लिए, आपकी CTC 8 लाख रु. है। नियोक्ता/ कंपनी आपको वित्त वर्ष के लिए 50,000 रुपये का बोनस देती है। आपकी कुल ग्रॉस सैलरी 7.5 लाख रु. (8 लाख रुपये – 50,000 रुपये) होगी।
फिर आप प्रति वर्ष 2,400 रुपये का प्रोफेशनल टैक्स काटते हैं। (प्रोफेशनल टैक्स हर राज्य में लागू नहीं होता है। जहां लागू होता है, वहां अलग- अलग हो सकता है)
फिर आप ईपीएफ योगदान डिडक्ट करें जो कि बेसिक सैलरी 15,000 रु. प्रति माह का 12% है, यानी 1,800 रु. प्रति माह या 21,600 रु. प्रति वर्ष। अब कर्मचारी द्वारा ईपीएफ के लिए किए गए वार्षिक योगदान के रूप में 21,600 रु. और नियोक्ता/ कंपनी द्वारा भी 21,600 रुपये के समान योगदान को डिडक्ट करना होगा।
कर्मचारी बीमा के रूप में 3,000 रु. की कटौती भी होती है।
इस तरह आपकी कुल कटौती होगी-
| कुल कटौती = 2,400 रुपये + 21,600 रुपये + 21,600 रुपये + 3,000 रुपये = 48,600 रु. |
इस प्रकार, आपकी टेक-होम सैलरी होगी:
| टेक होम सैलरी = ग्रॉस पे – कुल कटौती = 7,50,000 रु. – 48,600 रु. = 7,01,400 रु. |
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सैलरी स्ट्रक्चर (Salary Structure) बनाते समय मुख्य रूप से तीन बातों का ध्यान रखना चाहिए:
प्रश्न. एचआरए पर कौन से टैक्स बेनिफिट क्लेम किए जा सकते हैं?
उत्तर: कर्मचारियों को मिलने वाले एचआरए पर हमेशा पूरी तरह से टैक्स से छूट नहीं मिलती है। आपको HRA पर टैक्स में छूट कैसे मिलेगी, इसकी शर्तें निम्नलिखित हैं:
प्रश्न. ग्रेच्युटी क्या (Gratuity kya hai) है?
उत्तर: ग्रेच्युटी एकमुश्त लाभ है जो नियोक्ताओं/ कंपनी द्वारा उन कर्मचारियों को दिया जाता है जो कंपनी को 5 साल के बाद छोड़ रहे हैं। नौकरी के दौरान कर्मचारी द्वारा प्रदान की गई सेवाओं के लिए आभार ज़ाहिर करने के लिए ग्रेच्युटी राशि का भुगतान किया जाता है। पेमेंट ऑफ ग्रेच्युटी एक्ट, 1972 के मुताबिक, ग्रेच्युटी की कैलकुलेशन बेसिक सैलरी के 4.81% के रूप में की जाती है। 10 या अधिक कर्मचारियों वाली अधिकांश कम्पनियाँ इस अधिनियम के अंतर्गत आती हैं।
प्रश्न. सैलरी में सीटीसी का फुल फॉर्म क्या होता है?
उत्तर: सैलरी में सीटीसी का फुल फॉर्म “कॉस्ट टू कंपनी” (Cost to Company) होता है।
प्रश्न. फाइनेंशियल ईयर और असेसमेंट ईयर में क्या अंतर है?
उत्तर: एक फाइनेंशियल ईयर वह वर्ष होती है जिसमें टैक्सिंग और अकाउंटिंग उद्देश्य शामिल होते हैं। यह 1 अप्रैल से शुरू होती है और अगले वर्ष के 31 मार्च को समाप्त होती है। दूसरी ओर, असेसमेंट ईयर वह वर्ष है जिसमें आप अपना रिटर्न फाइल करती हैं। यह वह वर्ष है जिसमें वित्तीय वर्ष में कमाई गई आय का मूल्यांकन किया जाता है।
प्रश्न. आप मासिक टेक होम सैलरी को कैसे कैलकुलेट करते हैं? साथ ही CTC में बेसिक सैलरी कितनी होती है?
उत्तर: आप सीटीसी से कर्मचारी के ईपीएफ में योगदान, ग्रेच्युटी, श्रम कल्याण कोष जैसे विभिन्न प्रोविज़न को घटाकर टेक होम सैलरी को कैलकुलेट कर सकती हैं। आम तौर पर, सीटीसी का 40-45% बेसिक सैलरी ही होती है।
प्रश्न. CTC और टेक होम सैलरी में क्या अंतर है?
उत्तर: CTC यानी ‘कॉस्ट टू कंपनी’, एक कर्मचारी का सालाना कुल सैलरी पैकेज होता है। दूसरी ओर, टेक-होम सैलरी वह एक्चुअल पेमेंट होती है जो एक कर्मचारी अपने बैंक अकाउंट में मासिक वेतन के रूप में प्राप्त करता है।
प्रश्न. एलटीए सीटीसी ब्रेक अप को कैसे कैलकुलेट किया जाता है?
उत्तर: लीव ट्रैवल अलाउंस का भुगतान कर्मचारियों द्वारा देश में ही किए गए ट्रैवल संबंधी खर्च को कवर करने के लिए किया जाता है। एलटीए बेसिक सैलरी का 8.33% होता है, इसे कंपनी द्वारा कर्मचारी के ग्रेड और मूल स्थान के आधार पर तय किया जा सकता है।
प्रश्न. क्या PF को ग्रॉस सैलरी पर कैलकुलेट किया जाता है? ग्रॉस सैलरी में बेसिक सैलरी का कितना प्रतिशत होता है?
उत्तर: ज़्यादातर मामलों में, निजी क्षेत्र में काम करने वालों के लिए बेसिक सैलरी पर पीएफ कंट्रीब्यूशन को कैलकुलेट किया जाता है। उदाहरण के लिए, यदि आपकी महीने की बेसिक सैलरी 30,000 रु. है, तो आपके और आपके नियोक्ता/ कंपनी द्वारा प्रति 3,600 रु. (बेसिक सैलरी का 12%) पीएफ में योगदान किया जाएगा। बेसिक सैलरी ग्रॉस सैलरी की या तो 50% या 60% होती है।
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