भारत में, ये टैक्स आय पर इनकम टैक्स दरों के मुताबिक लागू किया जाता है। मतलब, कम आय पर टैक्स कम दर के हिसाब से और ज्यादा आय पर उच्च टैक्स दर लगता है। वर्तमान में, भारत में इनकम टैक्स साइकिल 1 अप्रैल से शुरू होकर और अगले 31 मार्च को समाप्त होता है।
इनकम टैक्स क्या है?

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डायरेक्ट टैक्स क्या है और ये इन-डायरेक्ट टैक्स से कैसे अलग होता है?
टैक्स को विशेष रूप से दो प्रमुख हिस्सों में बांटा गया है – डायरेक्ट टैक्स और इन-डायरेक्ट । डायरेक्ट टैक्स (Direct Tax) का आकलन सीधे सरकार द्वारा किया जाता है और इसका सबसे साधारण उदहारण है इनकम टैक्स और कॉर्पोरेशन टैक्स। इन-डायरेक्ट टैक्स (Indirect Tax) की स्थिति में, आप खरीदारी या किसी तरह की सेवा लेने पर टैक्स का भुगतान करते हैं। उदहारण के लिए, वैट (वैल्यू एडेड टैक्स) और जीएसटी (गुड्स एंड सर्विस टैक्स)। भारत में, जहाँ इनकम टैक्स की अलग-अलग दरें हैं, वहीं इन-डायरेक्ट टैक्स अलग-अलग तरह की खरीदारी या सेवा के आधार पर लगाया जाता है।
इनकम टैक्स किसे भरना होता है?
आयकर अधिनियम के मुताबिक, कोई भी व्यक्ति/व्यापार, जो कमाई कर रहा है फिर चाहे उसकी रकम कुछ भी क्यों ना हो, उसे इनकम टैक्स (Income Tax) भरना ज़रूरी है। हालाँकि, वर्तमान में बजट 2025 के अनुसार आय पर टैक्स सिर्फ उन्हें ही भरना है, जिनकी सालाना कमाई 12 लाख रुपयों से ज्यादा (75 लाख रु. की स्टैंडर्ड डिडेक्शन को मिलाकर 12.75 लाख रु.) है। ये निम्नलिखित प्रकार के व्यक्ति और संस्थाएं हैं, जो टैक्स का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी हैं, बशर्ते कि वित्त वर्ष 2025-26 के लिए उनकी कुल कमाई इनकम टैक्स के दायरे में आती है:
इनकम टैक्स दर क्या होती है?
भारत में कमाई पर टैक्स इनकम टैक्स दरों के मुताबिक, लगाया जाता है। ये दरें व्यक्ति की वार्षिक कमाई के अनुसार होती हैं। ये इनकम टैक्स दरें व्यक्ति की वार्षिक कमाई के मुताबिक, बढ़ती-घटती हैं। ये दरें समय-समय पर बदल भी सकती हैं और इनका ऐलान यूनियन बजट घोषणा में किया जाता है। फाइनेंशियल वर्ष 2025-2026 और एसेसमेंट वर्ष 2026-2027 के मुताबिक, नया टैक्स स्लैब निम्नलिखित है:
प्रति व्यक्ति के लिए इनकम टैक्स दरें
| इनकम टैक्स स्लैब (₹) | आयकर दर (%) |
|---|---|
| ₹0-4 लाख | शून्य |
| ₹4 – ₹8 लाख | 5% |
| ₹8 – ₹12 लाख | 10% |
| ₹12 – ₹16 लाख | 15% |
| ₹16 – ₹20 लाख | 20% |
| ₹20 – ₹24 लाख | 25% |
| ₹24 लाख से ज्यादा | 30% |
नोट- सीनियर सीटिज़न के लिए ब्याज से होने वाली इनकम पर कर कटौती की लिमिट 50,000 रु से बढ़ाकर 1 लाख रु. कर दिया गया है।
इस आय के लिए:
व्यवसाय के लिए इनकम टैक्स दरें
सहकारी समितियों (co-operative societies) के लिए :
| स्थिति | इनकम टैक्स दरें (सरचार्ज और सेस को छोड़कर) |
|---|---|
| कुल टर्नओवर या पिछले साल का सकल रिसिप्ट ₹400 करोड़ से अधिक न हुआ हो | 25% |
| जब सेक्शन 115BA चुनते हैं | 25% |
| जब सेक्शन 115BAA चुनते हैं | 22% |
| जब सेक्शन 115BAB चुनते हैं | 15% |
| कोई भी घरेलू कंंपनी | 30% |
सरचार्ज, मार्जिनल रिलिफ और स्वास्थ्य व शिक्षा सेस
सरचार्ज
मार्जिनल रिलिफ
स्वास्थ्य और शिक्षा सेस
रिटर्न भरना अनिवार्य है
जुर्माने से बचें
किस तरह की कमाई पर टैक्स लगता है?
आयकर अधिनियम 1961 के मौजूदा नियमों के अनुसार, निम्न प्रकार की आय पर लागू दरों के अनुसार टैक्स लगता है:
इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) भरने के लाभ
जिस भी व्यक्ति की आय इनकम टैक्स के दायरे में आती है उसे इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) फाइल करना चाहिए। अगर आपकी उम्र 60 वर्ष से कम है और आपकी आय 12 लाख रु. से कम है, तो आपको इनकम टैक्स भरने की आवश्यकता नहीं है। ऐसा देखा गया है कि कई नौकरीपेशा व्यक्ति ये सोचते हैं कि उनकि सैलरी से TDS काट लिया गया है इसलिए उनकी ज़िम्मेदारी खत्म हो गयी।
इनकम टैक्स रिटर्न भरना और इनकम टैक्स जमा करना, ये दोनों अलग काम है। अगर आप टैक्स के दायरे में नहीं आते हैं, तब भी आपको आयकर रिटर्न भरना चाहिए। आयकर रिटर्न भरने के कई लाभ होते हैं:
इनकम टैक्स रिटर्न जमा करना
आयकर अधिनियम के अनुसार, इनकम टैक्स रिटर्न जमा करना अनिवार्य है, अगर:
ई-फाइलिंग इनकम टैक्स
इनकम टैक्स जमा करने से पहले आपको इस बात की जानकारी होनी चाहिए कि इनकम टैक्स की गणना कैसे होती है। इससे आपको सिर्फ इसी बात का अंदाज़ा नहीं लगेगा कि आपको कितना इनकम टैक्स भरना है, बल्कि ये भी पता चलेगा कि आप अपना टैक्स कैसे बचा सकते हैं। अगर आपको इनकम टैक्स स्लैब की जानकारी है, तो आपके इनकम टैक्स की गणना करना आसान है। इनकम टैक्स की राशि, उन टैक्स दरों की गणना कर के निकाली जाती है, जो वर्तमान में मौजूद हों, फिर उनमें से TDS (टैक्स डिडक्शन एट सोर्स) के द्वारा भरे जा चुके टैक्स को घटा दिया जाता है, उसके बाद जो राशि बची, वो भरनी होती है।
अपने टैक्स की अधिकतर राशि बचाने के लिए, ज़रूरी है कि आप जान लें कि आपको आयकर अधिनियम, 1961 के तहत कितनी टैक्स छूट मिली है। कुछ निवेश करने पर, जैसे राष्ट्रीय बचत प्रमाण पत्र और पब्लिक प्रोविडेंट फण्ड आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 80C के तहत टैक्स छूट मिलती हैं। हालांकि, कई करदाता इनकम टैक्स भरते समय उन निवेशों का ज़िक्र करना भूल जाते हैं जिन पर टैक्स छूट मिलती है। आयकर अधिनियम की धारा 80C के तहत, जिन निवेश पर टैक्स छूट मिलती है वो निम्नलिखित हैं:
विभिन्न धाराओं के तहत टैक्स छूट की अनुमति
एक करदाता आयकर अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत टैक्स छूट की मांग कर सकता है। उनमें से कुछ निम्नलिखित हैं :
इनकम टैक्स रिबेट
इनकम टैक्स एक्सेम्प्शन, इनकम टैक्स रिबेट और इनकम टैक्स डिडक्शन में के बीच अंतर को नहीं समझ पाते। भले ही ये सभी शब्द करदाता के लाभ से संबंधित हैं लेकिन इन अर्थ अलग-अलग है।
टैक्स डिडक्शन और एक्सेम्प्शन के बीच अंतर
नौकरीपेशा व्यक्तियों के लिए टैक्स छूट के लाभ
आयकर अधिनियम के अनुसार, नौकरीपेशा व्यक्ति कई प्रकार की टैक्स छूट के योग्य हैं। नौकरीपेशा व्यक्तियों को अपने नियोक्ता/कंपनी को ये बताना होगा कि वो इस छूट के लिए क्लेम कर रहे हैं। ताकि TDS काटते समय नियोक्ता/कंपनी उनकी बची हुई आय पर ही टैक्स लगाएं। टैक्स छूट की जानकारी इस प्रकार है:
टैक्स योजना
टैक्स सलाहकार की मदद के बिना टैक्स योजना
टैक्स चोरी से बचें
भारत की मुख्य दिक्कतों से एक ये है कि यहाँ कर दाताओं की संख्या बहुत कम है, इसका मतलब यहाँ टैक्स की चोरी बहुत बड़े पैमाने पर होती है। टैक्स चोरी एक गैरकानूनी क्रिया है, जिसमें लोग या तो अपना इनकम टैक्स रिटर्न फाइल नहीं करते या फिर अपनी वार्षिक कमाई छुपाते या कम बताते हैं।
यदि आयकर अधिकारीयों ने बारीकी से जांच की और उन्हें ये पता चला कि आपने जानबूझकर टैक्स चोरी की है, तो आपको हर्जाना देना होगा। आपने जितनी रकम छुपाई है जुर्माना उसका तीन गुना हो सकता है। इसलिए सबसे बेहतर है कि आप बेहद सावधानी से आयकर रिटर्न फाइल करें क्योंकि यदि अवैधता के लिए बारीकी से जांच हुई तो आपको गंभीर जुर्माने का सामना करना पड़ सकता है।
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FAQs
TDS और इनकम टैक्स में क्या फर्क होता है?
TDS, वो तरीका है जहां प्राप्तकर्ता को रकम मिलने से पहले ही उसका टैक्स काट लिया जाता है। जहाँ TDS आमतौर पर सैलरी के भुगतान से जुड़ा होता है, वहीँ कई अलग तरह की आय पर भी ये लागू होता है, जैसे लाटरी से मिली रकम, कानूनी जुए में जीते पैसे, मकान का किराया, स्वछन्द काम, संपत्ति की बिक्री, आदि। इसलिए TDS कर इकठ्ठा करने की कार्यविधि है, जब कि इनकम टैक्स का मतलब है वो टैक्स, जो एक व्यक्ति की वार्षिक कमाई पर लगता है।
प्रोफेशनल टैक्स और आयकर में क्या अंतर है?
प्रोफेशनल टैक्स राज्य स्तर का टैक्स है, जो व्यक्ति की उस आय पर लागू है जो उसने किसी विशेष राज्य में कमाई हो। इस वक़्त, प्रोफेशनल टैक्स सिर्फ उन लोगों पर लागू है, जो उन ख़ास राज्यों में रह रहे हैं जो प्रोफेशनल टैक्स लेते हैं और प्रोफेशनल टैक्स का दर और उसकी छूट की सीमा हर राज्य में अलग होती है। जबकि, इनकम टैक्स केन्द्रीय टैक्स है, जो लोग सीधे केन्द्रीय सरकार को देते हैं और इसका दर पूरे भारत में एक ही होता है। ये भी बता दें, कि अगर आपने प्रोफेशनल टैक्स दिया है इनकम टैक्स जमा करते वो रकम टैक्स छूट के रूप में काट ली जाएगी।
इनकम टैक्स और इनकम टैक्स रिटर्न में क्या अंतर है?
इनकम टैक्स वो टैक्स है, जो एक व्यक्ति/फर्म/कंपनी की आय पर वित्तीय वर्ष में लागू किया जाता है। व्यक्ति की इनकम टैक्स की गणना मौजूदा इनकम टैक्स स्लैब रेट और टैक्स छूट, कर आदि, को ध्यान में रख कर की जाती है। जबकि, इनकम टैक्स रिटर्न इस बात का रिकॉर्ड है कि फाइनेंशियल वर्ष में आपने कितनी कमाई की, आप पर कितना टैक्स बना और कितना आपने जमा किया। ये रिकॉर्ड लागू आयकर विभाग को जमा किया जाता है, जिसे इनकम टैक्स रिटर्न फॉर्म कहते हैं। इनकम टैक्स रिटर्न फॉर्म को जमा करने की इस क्रिया को इनकम टैक्स रिटर्न फाइल कहते हैं। इसका मतलब, इनकम टैक्स वो टैक्स होता है, जो आय पर लागू होता है और आयकर रिटर्न वो सालाना रिकॉर्ड होता है, जिसमे आय और टैक्स की विस्तृत जानकारी होती है।
टैक्स और ड्यूटी में क्या अंतर है?
टैक्स वो भुगतान होता है , जो एक व्यक्ति या संगठन को अपनी कमाई के आधार पर देना होता है। इनकम पर लागू टैक्स इनकम टैक्स कहलाता है, ये एक डायरेक्ट टैक्स है। जबकि खर्च पर लागू टैक्स इन-डायरेक्ट टैक्स होता है। ड्यूटी भी एक तरह का टैक्स होती है, जो सिर्फ आयात और निर्यात पर लागू होती है। जब ये ड्यूटी किसी आयातक देश पर लगती है तो इसे आयात शुल्क कहते हैं और जब ये किसी निर्यातक देश पर लगती है, तो इसे निर्यात शुल्क कहते हैं।
पैसाबाज़ार एक लोन एग्रीगेटर है और अपने पार्टनर्स की ओर से सेवाएं प्रदान करने के लिए अधिकृत है।
पर्सनल लोन की APR (एनुअल परसेंटेज रेट) लोन लेने की कुल वार्षिक लागत को दर्शाती है। इसमें न केवल ब्याज दर, बल्कि प्रोसेसिंग फीस, डॉक्यूमेंटेशन फीस और लोन जारी करने की प्रक्रिया के दौरान लिए जाने वाले अन्य सभी शुल्क भी शामिल होते हैं।
APR को प्रतिशत के रूप में दिखाया जाता है। इससे आवेदकों को उन पर्सनल लोन योजनाओं की पहचान करने में मदद मिलती है जिनमें ब्याज दर तो कम होती है, लेकिन प्रोसेसिंग फीस या अन्य शुल्क अधिक होने के कारण उनकी वास्तविक लागत ज़्यादा हो सकती है। पर्सनल लोन की APR आमतौर पर 11.29% से 35% के बीच होती है।
उदाहरण के लिए, मान लीजिए आप 10.50% प्रति वर्ष की ब्याज दर पर 5 साल के लिए 5 लाख रु. का पर्सनल लोन लेते हैं। यदि इस पर 1.5% प्रोसेसिंग शुल्क (7,500 रु.) लगाया जाता है, तो आपके पर्सनल लोन की कुल वार्षिक लागत 1,52,317 रु. होगी और इसका APR 11.16% होगा।
पता: पैसाबाज़ार मार्केटिंग एंड कंसल्टिंग प्राइवेट लिमिटेड, 135 P, सेक्टर 44, गुरुग्राम (हरियाणा) - 122001
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