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भारत में निवेशकों के पास निवेश के लिए बहुत से विकल्प उपलब्ध हैं, म्यूचुअल फंड की योजनाओं की अपनी एक लम्बी लिस्ट है। म्यूचुअल फंड के प्रकार को मुख्यता डेट, इक्विटी, हाइब्रिड, इंडेक्स फंड में बांटा जा सकता है।
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जब भी आप इन फंड में निवेश करें तो लॉन्ग टर्म शॉर्ट टर्म की अवधि के साथ उसका एक विशेष उद्देश्य और जोखिम की क्षमता का होना जरूरी है। अन्य निवेश विकल्पों के साथ तुलना किए जाने पर म्यूचुअल फंड्स सुविधाजनक व अच्छी तरह से मैनेज किए जाते हैं और इसमे अधिक लाभ की संभावना होती है। चुने गए फंड के प्रकार के आधार पर लिक्विडिटी के साथ-साथ प्रवेश/ निकास का आसान विकल्प भी प्रदान किए जाते हैं। वहीं इमरजेंसी में आप इन फंड को रिडीम भी कर सकते हैं।
इस लेख में हम आपको यह तय करने में मदद करेंगे कि कब आपको अपने फंड को रिडीम करना है और कब नहीं करना चाहिए और कैसे करना चाहिए।

म्यूचुअल फंड रिडम्पशन वह प्रक्रिया है, जहां निवेशक किसी विशेष फंड में किए निवेश यूनिट को बेचना चाहता है। कभी कभी व्यक्तिगत कारणों से या फंड के अच्छे प्रदर्शन का अनुमान लगा कर निवेशक द्वारा फंड्स को समय से ज्यादा लॉक रखने का विचार गलत हो सकता है। निवेशक अपने निवेश में बदलाव के लिए फण्ड बदल भी सकता है।
जिस तरह म्यूचुअल फंड को शुरू करना आसान है, उसी तरह म्यूचुअल फंड को रिडीम करना और भी आसान है।
आपके म्यूचुअल फंड निवेश को रिडीम करने के मुख्य तरीके निम्नलिखित हैं:
यदि आपकी खरीद सीधे म्यूचुअल फंड हाउस (एसेट मैनेजमेंट कंपनी) के माध्यम से की गई है, तो आपके पास पोर्टल पर लॉग-इन करने के लिए एक आई.डी और पासवर्ड होगा। पोर्टल में लॉग-इन के बाद निवेशक ऑनलाइन ही यूनिट खरीद सकता है और किसी मौजूदा फंड यूनिट को आसानी से रिडीम कर सकता है।
आप अपनी योजना की सभी इकाइयों (यदि वे लॉक-इन नहीं हैं) को रिडीम कर सकते हैं या फिर उनमें से कुछ को रिडीम कर सकते हैं। यदि आप सभी इकाइयों को रिडीम करते हैं तो आपका अकाउंट बंद हो जाता है, लेकिन यदि आप कुछ ही यूनिट को रिडीम करते हैं तो बची हुई यूनिट बचे रहेंगे और उसी के अनुसार कार्य करेंगे।
आप AMC भी जा सकते हैं और अपने फंड रिडीम करने के लिए एक फॉर्म जमा कर सकते हैं। रिक्वेस्ट प्रोसेस होने के बाद रिडम्पशन की राशि N.E.F.T. के माध्यम से या पते पर भेजे गए चेक के माध्यम से निवेशक को ट्रांसफर कर दी जाएगी।
ऑनलाइन मोड एक आधुनिक व तेज़ माध्यम है। लेकिन गलत डेटा या हस्ताक्षर मिसमैच होने के कारण आवेदन अस्वीकार किया जा सकता है। इससे रिडेम्पशन प्रोसेस पूरा होने में देरी हो सकती है।
यदि आपका निवेश एजेंट के माध्यम से किया गया है, तो आप एजेंट के माध्यम से भी रिडेम्पशन कर सकते हैं। इस प्रक्रिया में म्यूचुअल फंड रिडेम्पशन फॉर्म भरना होगा जिसमें योजना और स्कीम का नाम, फोलियो नंबर के साथ-साथ यूनिट्स की संख्या की जानकारी देनी होगी। इसके बाद एजेंट कार्यालय में फॉर्म जमा करता है। एक बार रिडेम्पशन की प्रक्रिया शुरू करने के बाद रिडेम्पशन राशि N.E.F.T. ग्राहक के पते पर एक चेक के द्वारा ट्रांसफर की जाती है।
किसी A.M.C. या एजेंट से सीधे म्यूचुअल फंड खरीदने के अलावा, आप ऑनलाइन फंड हाउस पार्टनर पोर्टल जैसे www.paisabazaar.com के माध्यम से भी म्यूचुअल फंड खरीद सकते हैं। ये पार्टनर पोर्टल आपको रिडम्प्शन रिक्वेस्ट की भी सुविधा प्रदान करते हैं। यह प्रक्रिया काफी सरल है। इसके लिए सभी को एक लॉग-इन आई.डी. और पासवर्ड बनाना होगा। आप अपने म्यूचुअल फंड को उसी तरह रिडीम कर सकते हैं जिस तरह आपने यूनिट को खरीदा था। आपके द्वारा कन्फर्म करने के बाद रिक्वेस्ट को प्रोसेस किया जाता है और धनराशि लिंक किए गए बैंक अकाउंट में सीधे ट्रांसफर कर दी जाएगी।
यदि म्यूचुअल फंड को स्वयं के डीमैट या ट्रेडिंग अकाउंट से खरीदा गया हो तो रिडेम्पशन इसी अकाउंट के जरिए होता है। जैसे ही ट्रेडिंग प्रक्रिया ऑनलाइन पूरी हो जाती है, ई-पेमेंट उसी बैंक खाते में किया जाता है जो डीमैट खाते में रजिस्टर्ड होता है।
कंप्यूटर एज मैनेजमेंट सर्विसेज़ निवेशकों को अपने कार्यालय से ही कई A.M.C. के म्यूचुअल फंड को रिडीम करने का विकल्प देती है। इसमें रिडम्प्शन फॉर्म डाउनलोड किया जा सकता है और इसे भरने व हस्ताक्षर करने के बाद किसी भी कैम्स ऑफिस में जमा किया जा सकता है। कार्वी कंप्यूटर शेयर जैसी अन्य एजेंसियां भी ये सेवाएं प्रदान करती हैं। निवेशक इन एजेंसियों को चुनकर अपने फंड को रिडीम कर सकते हैं।
रिडम्प्शन रिक्वेस्ट के बाद उनकी जानकारी को वैरीफाई किया जाता है। और भुगतान निवेशक के रजिस्टर्ड बैंक खाते में 2-4 दिनों के भीतर ट्रांसफर कर दिया जाता है। चेक की स्तिथी में, इस प्रक्रिया को पूरा होने में कुछ और दिन भी लग सकते हैं।
यदि किसी की लॉक-इन अवधि समाप्त हो जाए तो कोई व्यक्ति अपनी मर्ज़ी से अपने म्यूचुअल फंड को रिडीम कर सकता है, लेकिन रिडम्पशन रिक्वेस्ट से पहले कुछ बातों को ध्यान में रखना आवश्यक है। इससे निवेशक को प्री-मेच्योर फंड को रिडीम करने में सहायता मिलती है जो अंतिम भुगतान की राशि को प्रभावित करते हैं। निवेशकों को अपने निवेश केवल निम्नलिखित कारणों से ही रिडीम करना चाहिए:
यदि निवेश का लक्ष्य पूरा हो गया हो। जैसे कि 5 वर्ष में कार खरीदने के लिए किसी ने निवेश करना शुरू किया था। जैसे-जैसे समय बीतता है, हमारी जरूरतें, लक्ष्य और उद्देश्य बदल जाते हैं। यदि इमरजेंसी में फंड की आवश्यकता हो तो यूनिटों की बिक्री से यह आवश्यकता पूरी हो सकती हैं।
यदि इस योजना में परिवर्तन हो रहे हों जो अब निवेशक के लिए सही नहीं है या यह निवेशक के उद्देश्य को पूरा नहीं कर सकता है। क्योंकि फंड मैनेजर के पास निवेश की अपनी व्यक्तिगत शैली होती है, जब इसका मैनेजर बदलता है तो निवेश का तरीका भी बदल जाता है। हालांकि, पहले एक वर्ष तक फंड के प्रदर्शन को ट्रैक करें और फिर फैसला करना उचित है।
यदि स्कीम या फंड का प्रदर्शन सही नहीं हो, लेकिन बेंचमार्क और पीयर फंड बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। इसका मतलब निवेश घाटे में है या केवल न्यूनतम रिटर्न/ लाभ मिल रहा है। लेकिन अस्थायी खराब प्रदर्शन का यह मतलब नहीं कि लंबे समय तक इसका प्रदर्शन खराब ही रहेगा। लेकिन अगर कोई फंड लगातार खराब प्रदर्शन कर रहा है, तो उपलब्ध यूनिट को बेचना ही अच्छा रहेगा।
फंड का प्रकार: यदि किसी ने ELSS में निवेश किया है जिसकी लॉक-इन अवधि 3 वर्ष की होती है, जिसका अर्थ है कि प्रत्येक इकाई को रिडीम करने से पहले कम से कम 3 वर्ष की अवधि पूरी होनी चाहिए भले ही वह SIP (सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान) के जरिए खरीदा गया है। इसी प्रकार, यदि आप के पास क्लोज एंडेड फंड्स या MFP हैं तो रिडेम्पशन केवल अवधि की समाप्ति या मेच्योरिटी पर ही हो सकता है।
एक्ज़िट लोड: ओपन एंडेड फंड में कोई लॉक-इन अवधि नहीं होती है। लेकिन अगर फंड को एक तय समय के भीतर रिडीम किया जाता है, तो उन पर एक्ज़िट लोड लगता है। उदाहरण के लिए: यदि किसी फंड को 1 वर्ष के भीतर रिडीम किया जाता है तो 1% का एग्जिट लोड लगाया जा सकता है। एक्ज़िट लोड में बदलाव होता रहता है क्योंकि यह तय शुल्क नहीं है, लोड की अवधि और एग्जिट लोड का प्रतिशत योजना पर निर्भर करता है।
भुगतान का समय: आमतौर पर 2-4 व्यापारिक दिनों में पे-आउट निवेशक के खाते में ट्रांसफर कर दिया जाता है। इसलिए यदि किसी विशिष्ट उद्देश्य के लिए धन की आवश्यकता है, तो पहले ही योजना बनाना चाहिए।
टैक्स: यदि इक्विटी म्यूचुअल फंड को एक वर्ष के भीतर रिडीम किया जाता है, तो इस पर 15% की दर से शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन टैक्स लगता है और साथ ही उस पर सरचार्ज और शिक्षा सेस लगेगा। यदि फंड एक वर्ष से अधिक समय के लिए रखे जाते हैं तो वे 1 लाख रूपये तक तो टैक्स फ्री होते हैं लेकिन 1 लाख रूपये अधिक के रिटर्न/ लाभ पर 10 % की दर से टैक्स लगता है।
और यदि यही फंड नॉन – इक्विटी म्यूचुअल फंड में निवेश किया जाता है तो इस पर 20% की दर से टैक्स लागू होगा, यदि यह 3 वर्ष से अधिक की अवधि के लिए रखा जाता है। यदि यह 3 वर्ष के भीतर रिडीम किया जाता है तो उस पर इनकम टैक्स स्लैब के अनुसार टैक्स लगता है। और इससे हुई इनकम पर TDS नहीं काटा जाता है।
मार्केट की अस्थिरता: इसमें लोग अक्सर शेयर बेचते हैं। लेकिन बाज़ार विशेषज्ञ और विश्लेषक हमेशा किसी भी बाज़ार में गिरावट के समय सामान्यता उंचे मूल्य पर रहने वाले कम कीमत के शेयरों को खरीदने की सलाह देते हैं। कम पर खरीदें और ऊंची कीमत पर बेचें, यह बाज़ार की पुरानी समझ है। लेकिन हम में से ज़्यादातर लोग इसका ठीक उल्टा करते हैं।
प्रत्येक गिरावट का उपयोग अच्छा प्रदर्शन करने वाले फंड की अतिरिक्त इकाइयों को खरीदने के लिए करना चाहिए और इस स्थिति का लाभ लॉंग टर्म में उठाना चाहिए। बाज़ार में गिरावट के दौरान किसी फंड को रिडीम करने से कम रिटर्न या फिर कैपिटल का नुकसान होगा। हालांकि, शॉर्ट टर्म के लिए इन निवेशों पर बाज़ार का असर पड़ता है। लेकिन लॉंग टर्म में शेयर में निवेश से हमेशा फायदा होता है। इसलिए घबराने और सबकी देखादेखी करने के बजाय, अपने निवेश की योजना बनाकर बाज़ार की इस मंदी का उपयोग करना चाहिए।
म्यूचुअल फंड में निवेश काफी आसान व सरल है, इन फंड को चुनते समय एक लॉंग टर्म योजना होना चाहिए। लॉंग टर्म योजना से इनकम, कैपिटल सिक्योरिटी और कैपिटल ग्रोथ होती है। हालांकि लॉंग टर्म योजना में काफी सब्र, प्रयास की जरुरत होती है, लेकिन अच्छे परिणाम के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ती है।
अधिक से अधिक लोग आजकल इन फंड की ओर रुख कर रहे हैं क्योंकि वे अच्छे रिटर्न/ लाभ देते हैं। क्योंकि इसमें फंड को अलग अलग निवेश किया जाता है। तो इससे जोखिम कम हो जाता है और अच्छे रिटर्न/ लाभ की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।
जब कोई व्यक्ति सीधे ही स्टॉक में निवेश का विकल्प चुनता है तो उसके लिए हमेशा ऐसे स्टॉक को तैयार करना संभव नहीं होता जो अलग अलग निवेश से सभी जोखिम की संभावनाओं को कम कर सके। दूसरी ओर, म्यूचुअल फंड अपने बड़े AUM के कारण, कई कंपनियों के शेयरों में निवेश कर सकते हैं।